व्यवस्था .......64 रिटायर्ड हर्ट

 

विप्राअस्मिन् नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणं गणः
को दाता रजको ददाति वसनं   प्रातर्गृहीत्वा निशि
को  दक्षः  परवित्तदारहरणे   सर्वोपि  दक्षो  जनः
कस्माज्जीवसि हे सखे ! विषकृमिन्यायेनजीवाम्यहम्
         चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 9
एक ब्राहमण से किसी ने पूछा, हे विप्र ! इस नगर में बड़ा कौन है ? ब्राहमण बोला, ताड़ के वृक्षों का समूह। प्रश्नकर्ता ने पूछा, इनमे दानी कौेन है ? ब्राहमण ने कहा, धोबी ! वह प्रातः काल कपड़े ले जाता है और शाम को ले आता है। प्रश्नकर्ता ने फिर पूछा, यहॉ चतुर कौन है ? उत्तर मिला दूसरों की बीवी को चुराने में सभी चतुर हैं। प्रश्नकर्ता ने आश्चर्य से पूछा, तो मित्र ! फिर यहॉ जीवित कैसे रहते हो ? तो उत्तर मिला कि, मैं तो ज़हर के कीड़ों की तरह बस किसी तरह जी ही रहा हूॅ।

 
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार संबंधी अपने एक निर्णय में कहा है कि ‘‘यदि गंगोत्री से ज़हर आ रहा हो तो गंगासागर में अमृत कहॉ से मिलेगा’’। और इस पूरे लेख का सार भी इस वाक्य में निहित है कि
...1947 में भारत आजा़द नही हुआ था सिर्फ ‘सत्ता का स्थानांतरण’ हुआ था। यही वजह कि आज के कानून अंग्रेजी सभ्यता के ज्यादा करीब नज़र आते हैं।...

आजादी के बाद हमारे यहॉ आर्थिक सुधार तो बहुत तेजी के साथ हुये किंतु न्यायिक सुधार, पुलिस सुधार एवं व्यवस्था सुधार में पर्याप्त प्रयास नही हुये। आर्थिक सुधार के द्वारा देश में पैसा बहुत आया। लक्ष्मी जी अकेले नही आती, कुछ ऐब भी लाती हैं। अब ऐसे ऐबी लोगों पर लगाम कसने के लिए ज़रूरी है कि आर्थिक सुधार, न्यायिक सुधार, पुलिस सुधार एवं व्यवस्था सुधार में सामंजस्य हो। ‘जन लोकपाल’ व्यवस्था में सुधार की अच्छी शुरूआत तो ह,ै किंतु अकेला चना भाड़ नही फोड़ता। इन सबके साथ जब तक हम पुराने चनों/कानूनों की आयलिंग नही करते, स्थिति मे ज्यादा परिवर्तन नही होगा। हमारे पुराने कानूनों की तो जैसे सरकारी नौकरी लगी हुयी है। व्यक्ति कर्मठ हो या निष्क्रिय, कार्यकाल पूरा करके ही दम लेगा। पहले रिटायरमेंट की आयु 58 थी फिर 60 हुयी। कुछ बुद्विजीवियो के लिए यह 62 भी है। इसके बाद उनकी सेवाओ से उन्हे रिटायर कर दिया जाता है। 2011 में आजादी को 64 साल हो गये हैं। इसके हिसाब से तो आजादी रिटायर हो चुकी हैं..? सिर्फ भावनाओं में उफान लाने के लिए मैने यह जुमला नही कहा है। यह एक ऐसी सच्चाई है जो यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या बहुत सी जगहों पर, जैसे कानून, व्यवस्था, सोच एवं आर्थिक सुधारों में नये रिक्रूटमेंट की जरूरत नही है....? जंतर मंतर पर जन लोकपाल के लिए एकत्रित भीड़ को शायद यह तो पता नही था कि सुधार कैसे और कहॉ से होना चाहिए। हॉ, आशा की जो किरण उन्हे दिखायी दी उसमें उन्होने भरपूर रोशनी ज़रूर भर दी।

सरकारी नीतियों में बहुत सी खामियॉ मौजूद हैं इसलिए देश में भारत और इंडिया के बीच फासिला लगातार बढ़ता चला जा रहा हैं। केंद्रिय मंत्री कमलनाथ की योजना आयोग पर हाल ही में की गयी टिप्पणी स्वयं बहुत से क्षेत्रों में कथनी एवं करनी का फर्क बता देती है कि ...आप लोग कुछ यहॉ से कुछ वहॉ से उठा कर किताब बना देते है। ए0 सी0 कमरों में बैठने वाले वास्तविकता क्या जाने ?... हमारी वर्तमान व्यवस्था भी व्यक्ति को ढ़ीठ बनाने का काम करती हैं। इस कहानी के द्वारा यह बात समझ में आती है।

...एक सज्जन व्यक्ति बड़े से शोरूम के बाहर से गुज़रा। वह शोरूम को अंदर से देखना चाहता था। उसने गेट पर बैठे एक चौकीदार से पूछा क्या मैं अंदर जा सकता हूॅ ? चौकीदार ने मना कर दिया। सज्जन व्यक्ति चुपचाप एक तरफ बैठ गया। तभी एक ‘कूल डूड’ आया और सीधा अंदर चला गया। सज्जन व्यक्ति ने चौकीदार से पूछा ? आपने उसको क्यों जाने दिया तो चौकीदार बोला उसने मुझसे पूछा ही कब था..?...  नियमों को मानने वालों की यही नियति होती है। संपूर्ण व्यवस्था में उनकी स्थिति एक एलियन से कम नही होती ? भ्रष्ट एवं कमज़ोर तंत्र की यह विचित्र विडंबना है कि ईमानदार एवं पाबंद व्यक्ति की गुजर यहॉ एक दिन भी संभव नही है। ...सब चलता है.... के कांसेप्ट ने ही आज हमें उस मुकाम पर ला खड़ा किया है जहॉ 121 करोड़ लोगों में अन्ना हजा़रे एंड पार्टी दूसरे ग्रह के प्राणी जैसे लगने लगे हैं।
पहले अन्ना हजारे एवं अब बाबा रामदेव ने देश की उर्जा को केंद्रित कर दिया है। इस उर्जा का कितना उपयोग होता है यह देखना रूचिकर होगा। जिस प्रकार भारतीय संविधान को बनाने के लिए विभिन्न देशों के चुनिंदा अंश लिये गये हैं वैसा ही मजबूत व्यवस्था बनाने के लिए करना होगा। दूसरों से सीखना अच्छा होता है। हमें विकसित देशों का ‘बेस्ट’ लेना चाहिए ना कि ‘वेस्ट’। विकसित देशों की अधिकतर चीजे सही हो यह आवश्यक नही है। अंधा अनुकरण कर हमनें अपनी मानसिक शांति ही भंग की है। तकनीकी तौर पर तो हम आगे बढ़ रहे है पर मानवीय दृष्टिकोण से पिछड़ रहे है। विकसित देश आर्थिक खुशहाली का दंभ तो भरते हैं किन्तु मानसिक खुशहाली उनके पास नही है। फ्रॉस के राष्टपति निकोलस सरकोजी ने समग्रता में खुशहाली ढूंढने के लिए आग्रहपूर्वक कई नोबेल विजेता जैसे लेआर्ड, अमर्त्य सेन, स्टिंगलिज्ग, पार्थदास गुप्ता जैसे अर्थशास्त्रियों को मानवीय खुशहाली का पैमाना निर्माण करने को कहा है, जिसका आधार आर्थिक न होकर जीवन स्तर, बेहतर पर्यावरण एवं नागरिक हित हों। ओबामा ने भी कानून पारित करके ऐसे इंडीकेटर बनाने के लिए कहा है जिसमें खुशहाली का आधार जीडीपी व आर्थिक समृद्वि न हो। आज जब  भारत मे अंर्तराष्टिय बाजा़र एक बड़ा बाज़ार देखता है तब  हमें अपने यहॉ की मंदी में बहुत कुछ गवॉ बैठे देशों से बच के रहना हैं। वह अब भारत पर नज़रें गड़ायें बैठे हैं। विदेशी पूॅजी के द्वारा सेंसक्स में आयी बढ़ोतरी पूॅजी के जाते ही अर्थव्यवस्था को चोट पहुॅचा जाती है। तेजी का जश्न भी लोग मना नही पाते कि मंदी आ जाती है। सबसे ज्यादा प्रभावित मध्यवर्ग ही होता है क्योंकि.. वह आकॉक्षाओं को पालता है। सपनो के सच होने के लिए ही निवेश करता है और वह ही मुॅह की खाता हैं। आजकल देश में एम एल एम की भी भरमार हैं। इनमे सपने बेचे जाते है। बेराजगारों को रोजगार दिया जाता है। लाखों लोगों को करोड़ो कमाने का तरीका बताया जाता हैं। भारत में 80 प्रतिशत आबादी गरीब है जिन पर सरकार का कई हजार करोड़ खर्च होता है। यदि यह संस्थाए वास्तव में अमीर बनाती हैं तो सरकार गरीबों को दी जाने वाली सारी योजनाओं को स्थागित कर दें एवं सभी बीपीएल कार्ड धारको को इनका मेंबर बनवा दे। पूरे भारत से गरीबी मिट जायेगी एवं भारत फिर से सोने की चिड़िया बन जायेगा। अगर अमीर बनने की प्रक्रिया इतनी सरल है तो ऐसी कंपनियों के मालिक वास्तव में ‘भारत रत्न‘ के हकदार है। जो कार्य सरकारें करने में नाकाम रही, वह काम यह कंपनियॉ कितनी आसानी से कर रही है ? यदि वास्तव में यह कंपनियॉ सक्षम हैं तो इनको बढ़ावा दिया जाये अन्यथा भारत के मध्य वर्ग को इनके मोहजाल से बचाया जाये। इसमें नया शिगूफा स्पीक एशिया, अल गल्फ जैसी दर्जनों एमएलएम हैं। कुछ सवालों के जवाब द्वारा पूरा भारत अमीर बनने की प्रक्रिया में है। कुछ समय पूर्व मध्यवर्ग को शेयर का चस्का लगा था। कुकरमत्तों की तरह उगे नये निवेशकों में अधिकतर ने सिर्फ गवॉया। हॉ, कुछ भाग्यशालियों ने जरूर कमाया। इसके निवारण के लिए मध्यवर्ग को ऐसे पूॅजी निवेश की तरफ ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो हमारी अर्थव्यवस्था की जड़ों को मजबूत करे न कि मौसमी फल की तरह आकर विदेशी पूॅजी को सम्मानित करे और हमे कंगाल करके चला जाये। मुझे तो पूरा खेल ही संदिग्ध दिखायी देता है। मध्य वर्ग की पूॅजी पर पड़ता यह बौद्विक डाका है। हमारी स्वयं की पूॅजी जो विदेशों में फॅसी है या काले धन के रूप में जमा हैं, का भारत में वापस आना एवं स्थानीय विकास पर निवेशित होना तो लाभकारी लगता है, किंतु बौद्विक डाके  को पचा पाना अभी थोड़ा कठिन है। बढ़ती मॅहगाई के कारण  भारत का मध्यवर्ग इतना त्रस्त है कि वह धन कमाने के हर मोहजाल को सच मान लेता है। जब खर्च बढ़ रहे हों तब आखिर कमायी कहीं से भी हो। बढ़ानी तो पड़ेगी ही। प्रधानमंत्री जी ने 100 दिन के कार्यकाल में काले धन की वापसी का वादा किया था किन्तु अब तो उनके कार्यकाल को दो वर्ष से भी ज्यादा हो गया है। इस धन के द्वारा मॅहगाई नियंत्रण सहित बहुत से कार्यो में मदद मिल सकती है। इसी प्रकार ज़रूरी वस्तुओ की कीमतों का बढ़ना प्राकृतिक न होकर कृत्रिम है। महॅगाई एक ऐसा पहलू है जिसमें हाल ही में शुरू हुये वायदा कारोबार एवं व्यवस्था के छिद्रो का फायदा उठाकर पूॅजीपति और अधिक अमीर एवं गरीब, लाचार होता जा रहा है।
हम भारतीय लोग कार्यो को अधूरा छोड़ देते हैं। कुछ समय काले धन एवं स्विस बैंक पर ध्यान लगाते हैं फिर खापों के तुगलकी फरमानों और अनावश्यक दिये जाने वाले फतवों का प्रतिकार करते हैं। कुछ समय महॅगाई पर भी चर्चा करते हैं। विश्व कप विजय का जश्न तो ऐसे मनाते हैं जैसे यह विजय हमारी समस्याओं के उपर समाधान की जीत हो। शायद हम कोई भी कार्य हाथ में लेकर एक सिरे से निपटाते नही हैं। समस्याए काफी उलझी हुयी हैं एवं रास्ता जटिल है। धरना प्रदर्शन करने वाले विपक्ष का कार्य भी सिर्फ सत्ता पक्ष का विरोध करना मात्र होता है मुद्दों को सुलझाना नही। मुद्दो के सुलझते ही सबकी राजनैतिक जमीन ही खिसक जायेगी।
 

योगदान : अमित त्यागी
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