हिंदी जगत

चिन्दी चिन्दी हो रही है हिन्दी- पढ़े तीसरा भाग

"बोलियों को संवैधानिक मान्यता दिलाने में वे स्वनामधन्य साहित्यकार सबसे आगे हैं जिन्हें हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा में पुरस्कृत और सम्मानित होने की उम्मीद टूट चुकी है. ये लोग भूल जाते है कि बाबा नागार्जुन को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी मैथिली कृति पर मिला था किसी हिन्दी कृति पर नहीं.आगे पढ़े डा. अमरनाथ के लेख का तीसरा और अंतिम भाग "

hindi ki boliyan

जो लोग बोलियो की वकालत करते हुए अस्मिताओं के उभार को जायज ठहरा रहे हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं.जिस देश में खुद राजभाषा हिन्दी अब तक ज्ञान की भाषा न बन सकी हो वहाँ ये लोग भोजपुरी, राजस्थानी, और छत्तीसगढ़ी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा दिलवाने की कोशिश कर रहे है. ये प्रयास कितने सफल होंगे ये आसानी से समझा जा सकता है.या तो इस बात को ये लोग समझ नहीं पा रहे या इन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है. 
अगर बोलियों और उसके साहित्य को बचाने की सचमुच चिन्ता है तो उनके साहित्य को पाठ्यक्रमों में शामिल करवाने की कोशिश होना चाहिए.उनकी फिल्मों के प्रचार की कोशिश होना चाहिए. इन बोलियों के मानकीकरण के प्रयास किए जाने चाहिए. उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करके हिन्दी से अलग कर देना और उसके समानान्तर खड़ा कर देना तो उसे और हिन्दी, दोनो को कमजोर बनाना है और उन्हें आपस में लड़ाना है.
मित्रो, मैं बंगाल का हूँ. बंगाल की दुर्गा पूजा मशहूर है.  मैं जब भी हिन्दी के बारे में सोचता हूं तो मुझे दुर्गा का मिथक याद आता है.  दुर्गा बनी कैसे ? महिषासुर से त्रस्त सभी देवताओं ने अपने-अपने तेज दिए थे.अतुलं तत्र तत्तेज: सर्वदेवशरीरजम्.  एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा.  अर्थात् सभी देवताओं के शरीर से प्रक़ट हुए उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी.  एकत्रित होने पर वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया  और अपने प्रकाश से तीनो लोकों में व्याप्त हो गया .तब जाकर महिषासुर का बध हो सका.
हिन्दी भी ठीक दुर्गा की तरह है.जैसे सारे देवताओं ने अपने-अपने तेज दिए और दुर्गा बनी वैसे ही सारी बोलियों के समुच्चय का नाम हिन्दी है. यदि सभी देवता अपने-अपने तेज वापस ले लें तो दुर्गा खत्म हो जाएगी, वैसे ही यदि सारी बोलियां अलग हो जाएँ तो हिन्दी के पास बचेगा क्या ? हिन्दी का अपना क्षेत्र कितना है ? वह दिल्ली और मेरठ के आस-पास बोली जाने वाली कौरवी से विकसित हुई है. हम हिन्दी साहित्य के इतिहास में चंदबरदायी और मीरा  को पढ़ते है जो राजस्थानी के हैं, सूर को पढ़ते हैं जो ब्रजी के हैं, तुलसी और जायसी को पढ़ते हैं जो अवधी के हैं, कबीर को पढ़ते हैं जो भोजपुरी के हैं और विद्यापति को पढ़ते है जो मैथिली के हैं.  इन सबको हटा देने पर हिन्दी साहित्य में बचेगा क्या ?
मित्रो, हिन्दी क्षेत्र की विभिन्न बोलियों के बीच एकता का सूत्र यदि कोई है तो वह हिन्दी ही है.  हिन्दी और उसकी बोलियों के बीच परस्पर पूरकता और सौहार्द का रिश्ता है.  हिन्दी इस क्षेत्र की जातीय भाषा है जिसमे हम अपने सारे औपचारिक और शासन संबंधी काम काज करते हैं. यदि हिन्दी की तमाम बोलियां अपने अधिकारों का दावा करते हुए संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईं तो हिन्दी की राष्ट्रीय छवि टूट जाएगी और राष्ट्रभाषा के रूप में उसकी हैसियत भी संदिग्ध हो जाएगी.
इतना ही नहीं, इसका परिणाम यह भी होगा कि मैथिली, ब्रजी, राजस्थानी आदि के साहित्य को विश्वविद्यालयों के हिन्दी पाठ्यक्रमों से हटाने के लिए हमें विवश होना पड़ेगा.विद्यापति को अबतक हम हिन्दी के पाठ्यक्रम में पढ़ाते आ रहे थे. अब हम उन्हें पाठ्यक्रम से हटाने के लिए बाध्य हैं.  क्या कोई साहित्यकार चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाय़ ?
हिन्दी ( हिन्दुस्तानी ) जाति इस देश की सबसे बड़ी जाति है.वह दस राज्यों में फैली हुई है.  इस देश के अधिकाँश प्रधान मंत्री हिन्दी जाति ने दिए हैं. भारत की राजनीति को हिन्दी जाति दिशा देती रही है. इसकी शक्ति को छिन्न –भिन्न करना है. इनकी बोलियों को संवैधानिक दरजा दो.  इन्हें एक-दूसरे के आमने-सामने करो.इससे एक ही तीर से कई निशाने लगेंगे.  हिन्दी की संख्या बल की ताकत स्वत: खत्म हो जाएगी. हिन्दी भाषी आपस में बँटकर लड़ते रहेंगे और ज्ञान की भाषा से दूर रहकर कूपमंडूक बने रहेंगे. बोलियाँ हिन्दी से

अलग होकर अलग-थलग पड़ जाएंगी और स्वत: कमजोर पड़कर खत्म हो जाएंगी.हम हिन्दी की किसी भी बोली के विकास के विरोधी नहीं है. कोई भी वैचारिक व्यक्ति किसी बोली या भाषा के विकास का विरोधी नहीं हो सकता. हमारी भावना है कि हिन्दी की सभी बोलियां खूब विकसित हो फले,फूले वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान भी बनाए लेकिन ये बात ध्रुव सत्य है कि अस्मिता के नाम पर बोलियों को हिन्दी से अलग कर उनके विकास का सपना देखने वाले लोग हिन्दी के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने की कोशिश कर रहे है और उनके इन प्रयासों से इन बोलियों का भविष्य भी अंधकार में आने की आशंका है. इसलिए सभी बुद्धिजीवियों को सरकार के इस प्रयास का विरोध करना चाहिए.
इस आलेख का पहला भाग यहाँ तथा दूसरा यहाँ देखा जा सकता है.

आलेख- डा. अमरनाथ
संपादन -सुबोध

योगदान : आलोक चतुर्वेदी
प्रकाशन दिनांक : 01-07-2012
print

नवीनतम लेख

a summer camp was organised for teaching hindi in minsk city of belarus by alesia.
this is a poem written by rajendra sinh fariyadi on water
higher education in hindi, atal bihari vajpeyi, hindi university, hindi teaching, bhopal, mohan lal chipa